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  कॉमेडी के नाम पर आजकल कुछ भी परोस देना आम बात हो गई है। बहुत कम ऐसे कॉमेडियन हैं जो गालियों के बिना बोल पाते हैं। हर दूसरी लाइन में गाली देना ये लोग (बोलने और सुनने वाले) कूल समझते हैं। अक्सर अपने माँ-बहन, पत्नी की कमजोरियों को हास्य का विषय बनाते हैं। गांव-देहात पर हँसते हैं। मोटी, पतली, सांवली पर मजाक बनाना इनके लिए आम बात है। 370 रुपये की बिरयानी हो या कोई और शो अक्सर ऐसे ही घटिया कंटेंंट, दोहरे अर्थ वाले वाक्यों से भरा होता है। कुछ शो मजाक में ऑन स्टेज लड़कियों को कुछ भी कहकर अपने को महान समझ लेते हैं। और हद्द बात ये है कि जनता इस सब पर हँसती है। परिवार के बड़े बच्चों के साथ इस सब को देखती है और हमें लगता है कि हम मॉडर्न बन रहे हैं।
  मदर्स डे आजकल दिन प्रचलन में हैं। कोई भी दिन जिस भी व्यक्ति विशेष के लिए होता है वह वास्तव में इसको कुछ स्पेशल फील करवाने का एक तरीका है। आज से कुछ साल पहले मुझे नहीं याद की हम कभी मदर्स डे भी मनाते थे पर आज पेटीएम से लेकर टीवी के ऐड तक इससे भरे पड़े दिखाई दिए। कुछ ब्रांड ने तो इस दिन के अवसर पर ऑफर तक दिए। अच्छा है। कम से कम महिलाओं के नाम एक दिन तो आया। लेकिन यहां रिस्पेक्ट से ज्यादा बाजार काम कर रहा है। स्पेशल फील करवाने के लिए आप कुछ और भी कर सकते हैं, लेकिन लोगों ने बाजार का सहारा लिया। हां कितना अच्छा फील हुआ, रिस्पेक्ट में इज़ाफा हुआ पता नहीं लेकिन बाज़ार की चांदी जरूर हुए। दूसरी बात हर दूसरी लाइन में मां बहन को याद करने वाले लोग जब कल मदर्स डे मना रहे थे तो क्यूट रहे थे
 विश्व विरासत दिवस पर जयपुर जाना हुआ। यह अच्छी पहल है कि इस दिन सभी ऐसी जगहों पर, जिन्हें धरोहर माना गया है, प्रवेश निशुल्क था। इसी कारण लोगों की संख्या तेज धूप के बावजूद भी कुछ ज्यादा थी। अक्सर घुमते हुए एक चीज मैं अनुभव करती हूँ कि आजकल लोग फोटों के लिए ज्यादा घूम रहे हैं, अनुभव के लिए कम। चीजों को देखने से ज्यादा हम किसमें/कहाँ अधिक सुंदर दिखाई देंगे, इस पर लोगों का ध्यान रहने लगा है। यह आगे के समय में घातक हो सकता है। 
  अक्सर घूमते हुए एक बात हर जगह महसूस करती हूं। समाज महिलाओं के प्रति बहुत क्रूर है। मैं बहुत कुछ की उम्मीद नहीं करती लेकिन एक साधारण साफ, सुथरा पैखाना तक हम महिलाओं के लिए यह देश नहीं मुहैया करवा सकता। मर्द अपने को पेड़, झाड़ी,दीवार जहां चाहे हल्का कर सकते हैं लेकिन महिलाएं? प्रकृति ने हमारा निर्माण इस तरह की गतिविधि के लिए नहीं किया है। कई बार बस में 4-5 घंटे ऐसे ही काटे। ड्राइवर, कन्डेक्टर से बोलो तो मैडम यहां ही चले जाओ कह कर मजाक बनाते मिल जाएंगे। जहां महिला शौचालय है भी वहां पानी न होना, साफ - सफाई न मिलना आम बात है। कई बार वह बंद पाए जाते हैं। बाज़ार, रेलवे स्टेशन कहीं भी चले जाइए आपको यह दिक्कत जरूर दिख जाएगी। आजकल महिलाएं बाहर निकलने लगी हैं पर अब उनके साथ यह समस्या हर वक्त मुंह बाय खड़ी रहती है।

चिरैया

  चिरैया चिरैया सीरीज आजकल काफी चर्चा में है। अपने छोटे छोटे वाक्यों और सहज भाव मुद्राओं द्वारा यह बेव सीरीज भारतीय समाज की बख़िया उधेड़ने का काम कर रही है। यह कहानी है एक पूजा की और कमलेश की। पूजा आधुनिक विचारों वाली लड़की है। जिसे अखबार को पहले पन्ने से पढ़ने की आदत है। वहीं दूसरी ओर कमलेश भारतीय समाज की उस स्त्री का प्रतिनिधित्व करती नजर आती है जिसे शादी के बंधन में बांध कर उसकी पढ़ाई रोक दी जाती है। जिसकी नजर में लुगाई का अखबार खाने - पीने वाला पेज है। उसे पहले पेज देश,दुनिया, राजनीति से कोई लेना देना नहीं होना चाहिए। उसके सोचने समझने के सारे दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं। आदर्श बहु का रोल उसको इस तरह सीखा दिया जाता है कि कोई भी नई चीज उसे नागवार गुजरती है। कहानी शुरू होती है पूजा और अरुण की देखने दिखाने की रस्म से। जहां ऐसी परिस्थिति में लड़कियों से आज भी उम्मीद की जाती है कि वह कोई भजन या अच्छा पुराना गीत गाएंगी पूजा एक इंग्लिश गाना गाती है। उसके ब्लाउज थोड़े डीप हैं, नए फैशन के हैं। कमलेश ने अरुण को अपने बेटे के जैसे पाला है, उसको लगता है कि वह कुछ गलत कर ही नहीं सकता। शादी से प...
  एक पुरुष का कमरा दिमाग में लाइए। ठीक? अब एक स्त्री का कमरा सोचिए। दोनों में कुछ अंतर मिला? जेएनयू में चुनाव के दौरान मेल हॉस्टल में कैंपेनिंग के समय शायद मुश्किल से 3-4 ऐसे पुरुष कमरे मिले जो व्यवस्थित, देखने में सुंदर कहे जा सकते हैं। वहीं दूसरी ओर लड़कियों के कमरे में ऐसे 2-4 ही थे जो व्यवस्थित नहीं कहे जा सकते। हम ऐसे ही बनाई जाती हैं और पुरुष भी। यदि हम बचपन से हम लड़कों को बेसिक चीजें सिखा दें साफ-सफ़ाई ,व्यवस्था, कपड़े तह लगाना, बर्तन साफ, सिंक को साफ रखना, तैलिया बिस्तर पर न छोड़ना, या अपनी चीजों को यथास्थान रखना, तो शादीशुदा महिलाओं की कुछ समस्या तो ऐसे ही हल हो जाएगी।

महिला दिवस

  स्वतंत्रता के बाद से आज तक हमारे देश में 1 प्रधानमंत्री, 2 राष्ट्रपति, लगभग 18 मुख्यमंत्री महिला रही हैं। ऐसे बहुत से पद हैं जिनमें हम आज तक प्रथम महिला के नाम को दर्ज करवा रहे हैं। कई क्षेत्र अभी भी जरूर बाकी होंगे जहां पुरुष सत्ता कायम होगी। Ncrb 2022 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 4,45,256 मामले दर्ज किए गए। यानी जब मैं लिख रही हूं और आप पढ़ रहे हैं तब भी किसी कोने में महिला किसी अपराध का शिकार हो रही है। रोज लगभग 80 महिलाएं बलात्कार झेल रही हैं। न जाने कितनी दहेज, हत्या, छेड़छाड़ को सह रही हैं। जो आंकड़े हैं वो उनके ही हैं जिनके केस रजिस्टर हुए हैं कई हजार तो सिर्फ मान मर्यादा के नाम पर चुप करवा दी जाती हैं। घर में महिलाओं का उनके शरीर, सोच, या किसी विशेष संदर्भ में पिछड़े होने का अक्सर मजाक बनाया ही जाता है। काम के क्षेत्र में आज भी यह माना जाता है कि वह एक सॉफ्ट टारगेट है। कामयाबी पर पहुंची महिला को हम बड़ी सरलता से चरित्र हीन, बिस्तर गर्म करने वाली घोषित कर देते हैं। किसी महिला का खुली सोच का होना, सबके साथ हँसने- हँसाने के व्यवहार को लेकर भी हम उसक...