चिरैया
चिरैया
चिरैया सीरीज आजकल काफी चर्चा में है। अपने छोटे छोटे वाक्यों और सहज भाव मुद्राओं द्वारा यह बेव सीरीज भारतीय समाज की बख़िया उधेड़ने का काम कर रही है। यह कहानी है एक पूजा की और कमलेश की। पूजा आधुनिक विचारों वाली लड़की है। जिसे अखबार को पहले पन्ने से पढ़ने की आदत है। वहीं दूसरी ओर कमलेश भारतीय समाज की उस स्त्री का प्रतिनिधित्व करती नजर आती है जिसे शादी के बंधन में बांध कर उसकी पढ़ाई रोक दी जाती है। जिसकी नजर में लुगाई का अखबार खाने - पीने वाला पेज है। उसे पहले पेज देश,दुनिया, राजनीति से कोई लेना देना नहीं होना चाहिए। उसके सोचने समझने के सारे दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं। आदर्श बहु का रोल उसको इस तरह सीखा दिया जाता है कि कोई भी नई चीज उसे नागवार गुजरती है। कहानी शुरू होती है पूजा और अरुण की देखने दिखाने की रस्म से। जहां ऐसी परिस्थिति में लड़कियों से आज भी उम्मीद की जाती है कि वह कोई भजन या अच्छा पुराना गीत गाएंगी पूजा एक इंग्लिश गाना गाती है। उसके ब्लाउज थोड़े डीप हैं, नए फैशन के हैं। कमलेश ने अरुण को अपने बेटे के जैसे पाला है, उसको लगता है कि वह कुछ गलत कर ही नहीं सकता। शादी से पहले पूजा LGBTQ के आंदोलन में सड़कों पर नारे लगाती हुई पाई जाती है, यहां से ही दर्शक उसके जेंडर के प्रति सोच को समझने लगते हैं। साधारण लोगों की तरह कमलेश को भी यही लगता है कि इस आंदोलन में भाग लेने का मतलब है कि पूजा भी लेस्बियन है। वह इस वजह से सगाई तक तोड़ने पर आमादा हो जाती है। वास्तव में कमलेश का डर उसकी सत्ता हिलने का डर है। वह परिवार के लिए एक ऐसी इंसान है जिसके आस पास सब इक्ट्ठा रहते हैं,पूजा के आने से उसकी यह सत्ता हिलती हुई महसूस होती है। इसलिए वह डर में है और धीरे धीरे अपने डर से सहज भी होती है।
कहानी की वास्तविक शुरुआत होती है पूजा की पहली रात से। शादी की चीजों से थकी पूजा बीमार है और शारीरिक संबंध के लिए अरुण को मना करती है। लेकिन अरुण को अपनी मर्दानगी को साबित करना था वह उसकी इच्छा के विरुद्ध शारीरिक संबंध बनाता है। यह सब पूजा को भीतर तक तोड़ देता है। वह बार बार ऐसा करता है। पूजा अपनी जेठानी यानी कमलेश को यह बताती है तो वहां से भी उसे यह समझने को मिलता है कि यह आदमी का हक है। और बतौर पत्नी तुम संबंध के लिए मना कर ही नहीं सकती। पूजा अपनी मां से यह बताती है और वहां भी उसे आदर्श पत्नी होने का पाठ मिलता है। हनीमून पर भी पूजा के साथ यही सब दोहराया जाता है। वह अरुण के पास जाने तक से घबराती है। और इसी वजह से अपने गुप्तांग पर ब्लेड से वार करती है, ताकि उसे सम्बन्ध न बनाने पड़े। जिसमें वह बाल बाल बचती है। कमलेश यह सब जब सुनती है तो उसे एहसास होता है कि पूजा किस दर्द और मानसिक वेदना से गुजरी है। वह अपने परिवार को यह सब बताती है पर वह सुनकर एक साधारण सी प्रतिक्रिया देते हैं। ऐसा व्यवहार जैसे कुछ हुआ ही नहीं। अंत में सब चीजों से लड़ती हुई पूजा और कमलेश समाज और औरतों के सामने अपने परिवार का सच रखती हैं। पूजा इस बात की उम्मीद करती है कि कभी तो ऐसा कानून आयेगा और वह अपने पति को सजा दिलवा पाएगी।
यह वेब सीरीज कई मायनों में महत्वपूर्ण है। यह समाज की और कानून को कई परतों में दर्शकों के सामने रखती है। मैरिटल रेप जैसी अवधारणा भारतीय समाज का हिस्सा है ही नहीं। यहां पति यानी वह जो पत्नी का सब कुछ है। यह सब कुछ इस समाज में इतना बड़ा बना दिया गया है कि वह कोई भी अपराध किसी भी हद तक जाकर कर सकता है। और कानून में कई बार उसको छूट भी मिल जाती है। हमारे समाज में एक केस यदि महिला पक्ष से हो जाए तो हम मीम बनाने लगते हैं रोज औरतों का मजाक बना देते हैं लेकिन महिलाओं की घुटन को हम बहुत सहजता से सुनकर अगले ही पल उन्हें रसोई में झोंक देते हैं। पत्नी हो तो सेक्स करना ही पड़ेगा जैसी अवधारणा हमारे समाज में भीतर तक रमी हुई है। वह महीने से हो या बीमार हो, थकी हो या उसका केवल मन न हो, गर्भवती हो' यह सब कुछ समाज के मर्दों को सुनना ही नहीं होता।
औरत हो औरत की तरह रहो का पाठ हर लड़की को पढ़ाया जा रहा है। पूजा का शारीरिक संबंध से इतना डर कि वह अपने अंगों को ही नुकसान पहुंचा दे उसके पति की हैवानियत को बताता है। पर समाज में महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा को इतना नॉर्मलाइज कर दिया गया है कि यह सब हमें कचोटना तो छोड़िए सोचने पर भी मजबूर नहीं करता।
चिरैया वेब सीरीज इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि वह बताती है कि औरत औरत की दुश्मन नहीं होती, दोस्त भी हो सकती है। और सच के साथ के लिए वह अपने खास रिश्तों को भी छोड़ सकती है। यह वेब सीरीज इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें हीरो बनने का काम पुरुषों को नहीं सौंपा गया बल्कि कहानी साधारण तरीके से पूजा (पीड़िता) और उसकी जेठानी कमलेश के पक्ष में खड़ी हो जाती है। यह वेब सीरीज हमें यह भी बताती है कि भले ही मर्द अपनी मूंछों पर कितना ही ताव क्यों न दें लें लेकिन ऐसी शायद ही इस समाज में कोई महिला या बच्ची हो जिसके साथ कोई अपराध न हुआ हो। यह कहानी यह भी बताती है कि कानून की नज़र में सब बराबर हैं पर वहां मैरिटल रेप जैसी अवधारणा नहीं है। पत्नी मतलब स्वीकार पति मतलब हर चीज की मनमानी।
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